छत्तीसगढ़ी उपन्यासःचन्द्रकला

उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी

Sunday, June 25, 2006

आत्मकथ्यः



।। कुछ अपने लोगों के लिए ।।



वर्तमान समय तकनीक एवं संचार का है । आजकल बिना अंतरजाल और कंप्यूटर के जीवन का हर क्षेत्र सूना-सूना लगता है । सच तो यह है कि नये समय में विकास का एक कोण कंप्यूटर और अंतरजाल केंद्रित हो चुका है । अब वह समय आ गया है कि हम हिन्दी सहित लोक-भाषाओं के विकास के अंतरजाल को ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लें । इससे हम अपनी बात, विचार, कला, साहित्य एवं संस्कृति को संपूर्ण विश्व में पलक झपकते ही पहुँचा सकते हैं ।
मैंने छत्तीसगढ़ी में यह उपन्यास लिखना शुरू किया था तो यह नहीं सोचा कि यह उपन्यास कभी चंद मिनटों में संसार के कई देशों के पाठकों के बीच पहुँच सकता है । लोग मनचाहा अंश घर बैठे बाँच सकते हैं । आज सुखद आश्चर्य होता है कि ऐसा संभव हो पा रहा है ।
अंतरजाल पर इस उपन्यास को स्थापित करने के लिए सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ के सभी रचनाकारों का मैं हृदय से आभारी हूँ जिसने हिन्दी सहित अन्य भाषा की कृतियों को संपूर्ण रूप से इंटरनेट पर रखने का अभियान प्रारंभ कर हम लेखकों को प्रोत्साहित किया है ।
इस अवसर पर मैं इस तकनीक संलग्न मेरे प्रिय भाई एवं ललित निबंधकार श्री जयप्रकाश मानस का विशेष आभार मानता हूँ जिन्होंने रात-रात भर जाग कर मेरा यह उपन्यास आपके सामने विश्व-जाल (INTERNET)पर लाने का उद्यम किया ।
अंत में मैं इस कृति के भूमिका लेखक भाई सुधीर शर्मा सहित सृजन-सम्मान परिवार के सभी सदस्यों का आभार मानता हूँ ।
जे. आर. सोनी
रायपुर

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