छत्तीसगढ़ी उपन्यासःचन्द्रकला

उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी

Sunday, June 25, 2006

भाग-एक

अधिरतिया बेरा म टिमकी डफरा के आवाज आत रहिस । घूप अंधियारी रात रहिस । माटी के दिया ह जुगर-जागर बरत रहिस । गोसाला के गाय, बईला मन एती-ओती चमके लगिन । बिसाहू चौकीदार ह चिमनी ल जला के देखिस, दूरिहा ले डफरा के डफ-डफ आवाज आत रहिस । महिंगल राउत के संग दोहा पारत आत रहिस । अंगना म आके जोर-जोर से बाजा बजाय लगिस । बाजा के सोर म घर के लईका मन जागे गे । बिसाहिन अऊ बिसाहू ह कंडील ल जलाइच, गड़वा बाजा के आवाज ह जोर-जोर से बाजे लगिच । बिसाहू ह गोसाला के दरवाजा ल खोलिच । महिंगल राउत ह सबे गाय, बईला के गर म सुहई बांधिच अऊ दोहा पारिच । अपन किसान ल आसीरबाद देइच ।
दोहा –
अन्न, धन्न कोठा भरे रहय जीवव लाख बरिस ।
अब के बरस हमन लेबो खूब बक्सीस ।।

कारी बछिया के गर म सुहई बांधत महिगल हा खूब रोईच । लक्ष्मी जी सदा सहाय बने रहव, हमार तो तुम्हारे से जिनगी चलत हावय, आँसू ह टप-टप चूहे लगिच । गोबर ल चंदन समझ के माथा म लगाईच । गाय, बईला ले आसीस माँग के आँसू ढारत कोठा ले निकलिच । सब संगवारी मिलके नाचिन । बिसाहू ह सब झन ल बिड़ी, माचिस देइच । चौरा म बईठ के पीईन । बिसाहू ह पूछिच, कतक घर बाँचगे हे । महिंगल कहिच, पांडे़ महाराज के घर बाँच गे हे । काल, देवारी तिहार हे, गड़वा बाजा के संग नाचत राउत मन बैकुंठपुर चले गिन । बिसाहू ह दरवाजा म तारा लगा के अपन कुरिया म सो गे । बिसाहिन ह अपन दूरा – दूरी ल सोबाइच । बिसाहू कहिच काल देवारी तिहार हे । कुछ रोटी – पीठा बनाय के तियारी कर लेबे । दुनों झन गोठियात बतियात कब नींद परिगे पता नई चलिच । भिनसार चार बजे कुकरा बासत गोड़ पारा ले माँदर के आवाज सुनाई दिच । सुकालू गोड़ ह ऐ बरिस गौरा – गौरी पूजा करे बर मनौती मनाय रहय । माँदर के थाप म झूम – झूम के बईगा मन नाचत रहिन । माटी लाय बर खार कोती जात रहिन । सुकालू के डउकी ह नवा लूगरा पोलखर सफेद रंग के पहिरे रहय, ओकर नाता – गोता मन सात झन गावत जात रहय़ । गाँव के गोठानन के बाद म पीपर रुख के खेत के डिलोरा ले मुकू माटी के होम देके कुदारी बईगा ह चलाईच । धरती माता के पूजा करके माटी कोड़के झौंहा म भरीन । तीन चार झौंहा माटी ल लेके आईन । माँदर के आवाज सुनके मुहल्ला के नर नारी मन जाग गे । बने भीड़ लग गे । घर के परछी ल माटी ल मंढ़ाईन । माँदर के आवाज ह ताक धीन धीन ताक धीन बाजे लगिच । सब झन मिलके झूम – झूम के नाचिन । बईगा ह पूजा करिके सब झन ल कहिच, गौरा – गौरी के बिहाव रात म होही । सब कोई आहा ।

बिसाहू के नींद ह देर म खुलिस, लकर-धकर बिसाहू ह बाहर कोती जंगल, फिरे तालाब के पार म गिच । सौच करिके तरिया के पार में हाथ मुँह धोके आ चाथे ।
गाय के दूध दूहे के काम म लग जाथे । बीस किलो दूध ल एक घंटा म निकारिस अऊ दूध, डब्बा-बाल्टी में रख दिच ।

गोसाला में दूध लेवईया मन के लाईन लग गे रहय । बारी-बारी ले सब झन ल दूध देइया साहब अऊ, सेठ जी के घर में दूध ल पहुँचाये चल गिच । जब साहेब के दूध ल पहिली देइच, अखिरी म सेठ जी के यहाँ पहुँचाईच । दिन के नौ बज गे रहिच, बिसाहिन ह अँगना ल गोबर म लिपिच अऊ आस-पास म गोबर के छींटा दिच । हउला बटकी, भंड़वा ल माँज के तियार करिच । चउंक के कुंवा ले चार हंउला, मरकी पानी पीये के लाईच । अंगना के तुलसी चौरा ल साफ करिच । बिसाहू ह गाय बईला ल पानी, चारा खवाईच । गौसाला के गोबर अऊ झाडू बिसाहिन ह करिच । दिन के बारह बज गे रहय । पेट म एको दाना नई पड़े रहय । बिसाहिन ह लईका मन ल बासी नुन मिरचा म धरा देहच । लईका मन बासी खाके खेले ल गली म निकर गिन ।

बिसाहिन ह बिसाहू ल कईथे, आज देवारी तिहार ऐ । कईसे चेत नई करत हव । घर म न चाउर ए, अऊ न तेल नून ऐ। जाके सेठ जी के दुकान ले कुछ लेत आवा उधार म । लईका मन पोट-पोट भूख म मर जाइय । बिसाहू कईथे, आज गाय-गरूवा ल भोजन, पकवान खिलाही ओही ल हमू मन खा लेबो । आज कोन सेठ ह देही, सब झन देवारी तिहार मनाय बर तियारी करत हावय । बिसाहिन ह कईथे, तंय नई जावास, त मय ह सेठ जी ले बिनती, हाथ जोड़हंव, मन पसीज जाहय त दे देही। बेरा-बेरा म सेठ जी सहजोग कर देथे । मंय हर चौंका बरतन साफ कर देथंव । बिसाहिन ह सेठ जी के घर जाके साफ-सफाई करे लगिच । जाय के बेरा म सेठ जी से दो सेर चाउर, तेल, नून माँगिच । सेठ जी कहिच, ले जा बिसाहिन, जल्दी पईसा जमा कर देबे नई तो ब्याज देय ल परही ।

बिसाहिन चाउर, तेल, नून मिरचा लेके घर आ गिच । सूरज देवता ह मुड़ के ऊपर आगे रहय । बिसाहिन ल देख के लईका दउड़त आगे । दाई खाये ल दे न बहुत भूख लगत हे । ओतके बेरा बिसाहू ह गोसाला ले जा जाथे, संग गाय-गरूवा ले बांचे खिचड़ी, रोटी, दार, भात बगोना म भरके लाथे । बिसाहिन ह बटकी म सब झन ल बाँट के खाय बर दिच । बिसाहू अऊ बिसाहिन ह बांचे-खूंचे दार, भात, खिचड़ी व मुँह म डारिन । दूनों झन के आँसू निकल गिच । बिसाहू कईथे, हमन जइसे लाखों लोगन मन भूख प्यास म मरत हावय, दो-दो तीन-तीन दिन ले अनाज के मुँह ल नई देखय । पानी, पसिया, भाजी पाला, खाके जीवन ल बचावत हे । छत्तीसगढ़ म तिरपन, छप्पन के अकाल पड़े हावय । धान के फसल ह ए साल बने हावय, सुकाल हे, अइसे ऐ साल लागत हे ।

बिसाहिन लकर-धकर तरिया ले नहा के आ जाथे । खाना बनाय बर आगी सुपचाय देथे, घंटा भर म भात, दार रांध देथे । लईका मन ल खाना खवा के अपन दूनों झन खाथे । भगवान ल धन्यवाद देथे कि सेठ जी ह हमर मन बर भगवान बन के आय हावय ।

बिसाहू ह गाय, गरू ल पानी, चारा, खवाईच-पिलाईच । माटी के दीया चारों दीवार, दरवाजा खिड़की म रखिच । दस बीस दीया अपन कुटिया म लाके जलाईच । बिसाहिन ह तुलसी चौरा म दीया रखिच, परनाम करिच । नवा कपड़ा लूगरा तो नई रहिच, फेर वोही पुराना लुगरा सोडा में धोये रहिच । लईका अऊ बिसाहू के कुरता ल धोय के सुखा दे हे रहिच । जे खनि सूरज देवता ह डूबत रहिच ते खनि ले लईका म फटाका के धूम धड़ाक सुरू होगे । बड़े बड़े बम फटाका के आवाज आये लगिच । लईका मन दाई के कोरा म सपट जावय, फेर रायगढ़ सहर के देवारी तिहार बहोत परसिद्ध हे । रामदेव अऊ कामदेव नोनी टेटकी ह चौरा म बईठे-बईठे देखत रहिन, काबर रायगढ़ सहर म पहिली देवारी आय । चारों खूँटा जगर-मगर बरत रहय । रायगढ़ सहर अगास ले कोई आकास गंगा जइसे झिलमिलात दिखय । लईका मन के बया भूला गे । कान ल अंगरी म तोप के रखे रहिच ।
बिसाहू ह गोसाला के अध्यक्ष महावीर गुप्ता के घर दीयी जलाय बर चल दिस । बिसाहू दीया म तेल भर-भर के जलावत गईस अऊ रखत गईस । एक सौ इक्कीस दीया जलाईच । फेर दुकान म जाके केरा पेड़ सइधो से खूंटा गाड़ के लगाईच । आमा पान के तोरन अऊ गोंदा फूल के माला ल बढ़िया सजाईच । सदर बाजार चऊक में दुकान सोना चाँदी के हावय, महावीर जी ह कोसा के धोती-कुरता पहिने रहय अऊ सब लईका मन नवा-नवा कपड़ा पहिने रहय । सब परिवार मिल के लक्ष्मी जी के पूजा करिन । बिसाहू दीया जला के परसाद देही कहिके देखत रहिच । पास के दुकान के पूजा समाप्त होगे रहिच । लाई, बतासा अऊ मोतीचूर के दो लड्डू दिच । कागच म लपेट के घर लिच । लईका मन फटाका फोरत रहिन, उंकर ले छोड़े एक-दू ठीन सुरसूरी, मिरची फटाका चार-पाँच ठन छिटक के फेंका गय रहय ओला उठाईच । एक ठन मोम बत्ती ह ठुठुवा पडे़ रहिच ओहू ल उठाईच । दुकान ल बंद करके सेठ जी घर म पूचा कर चल दिस । बिसाहू ल परसाद तक नई दिच, मन मसोसत गोसाला पारा अपन घर गिच ।

बिसाहू ह गमछा के छोर म परसाद ल गठियाय रहय । छोटकन नोनी टेटकी ह आवत देख लिस, ददा आगे ददा आगे चिल्लाय लगिच । रामदेव अऊ कामदेव घलो आगे । ददा कछु लाय होही कहिके खोजे लगिन । बिसाहू ह घर के दुवारी म बइठ के सुरसुरी अऊ मोम बत्ती ल दिस । टेटकी एक ठन सुरसुरी फूलझड़ी ल ढे़वरी में जलाय लगिच । बिसाहिन कहिथे बेटी बाहर अंगना में जलावव । आगी लग जाही गोदरी ओन्हा म । टेटकी सुरसूरी ल धरे दउड़त अंगना म चल देथे । रामदेव ह मोमबत्ती ला दीया से जलाथे । एक मिरची फटाका ल फोड़ते धम से फटाक, फटाक फूट जाथे । टेटकी ह अंगना ले भाग के दाई के कोरा में लुका जाथे । बिसाहिन कइथे ए सुरसूरी ल बार न तंय ह, देखत हच रामदेव अऊ कामदेव भईया मन सुघ्घर जलावत हे । टेटकी ह हिम्मत करके निकरिच, मोमबत्ती म सुरसूरी ल जलाईच । सुरसूर, भूरभूर बरे लगिच । टेटकी इ अंगना घर म दउड़े लगिच । एक-एक ठन फटाका फोड़िन फटाका खतम होये के बाद परसाद ल बिसाहिन ह बाँटिच । बिसाहू कईथे, का हमरे भाग ल बनाईच भगवान ह । हमन ल भुगते बर जन्माय हे । पूरा सहर दिवारी तिहार म जगमगात हे । हलवा, पूड़ी, खीर, मिठाई झड़कत हे । हमर एक लांघन दूर फरहार हे । हे भगवान, हे लक्ष्मी दाई काबर दूभेदिया करत हावव । सब मनखे ह समान जनमे हे । फेर धन सम्पत्ति, रूपया पईसा बर काबर अलग अलग देहे हच ।
देवारी म सहर के सहर जगमगात हे एक ठन अंधियार कुरिया म दू परानी गोठियात हे ।
“अभी हंड़िया नई चढ़े हे, थोरकन गुर-भात बांचे हे लइका मन ल खवादे, बाचही तेला हमन खाबोन”
“चल तरिया पार गौरा-गौरी के बिहाव देखे बर जाबो माँदर बाजत सबे झूमत नाचत है”
“चल सब झन जाबो”
“कइसे होथे गौरा-गौरी के बिहाव, मोर मइके चातर राज म नई देखे हंव”
“तोर मइके गाँव म का गौड़ ठाकुर नइये ये”
दूनों परानी टेटकी कामदेव अऊ रामदेव ल लेके तरिया पार गइन ।
गौरा अऊ गौरी के बिहाव फदगे रहय । एक कोती घराती दूसर कोती बराती । माटी के गौरा-गौरी बना के सुंदर सजा के दुल्हा-दुल्हन बइठारे रहय । मंड़वा सजा के मंगरोहन म तेल चढ़ाईन । सात तेल सब मंहतारी मन चढ़ाईन ।

गीत –
एक तेल चढ़िगे सिव पारवती के, हो सिव पारवती के, हो सिव पारवती के ।
अईसे-अईसे गीत मंगल छोहर गीत गावत रहय । भगवान सिव पारवती के बिहाव करके आत्म संतुष्टि मिलथे, मनौती मनाय ह पूरा हो जाथे । बने दाईज टीके ल परिच । रात भर बिहाव के नेग ल करीन । रात के तीन बजे बिसाहू ह घर म आके सो जाथे ।

बड़ भिनसार पाँच बजे बिसाहू ह उठ बईठिच । तरिया पोखर गईच । तब तक सूरज देवता ह उवत रहय । गाय गौरू ल चारा पानी देईच । दुधारू गाय मन ल बाँध के दूध दूहे लगिस । घंटा भर म दूध दूह के तियार होगे । दुध ल डब्बा, बाल्टी म भर दिच । गोसाला ले माहवारी दूध लेवईया मन लाइन लगा लेवय । सब झन ल दूध देहे के बाद अधिकारी अऊ सेठ जी के निवास, बंगला में पहुँचाईच ।
बिसाहिन ह बटकी भांड़ा माँज के कुँवा ले पाँच घघरा पानी पीये के भरिच । गोसाला के गोबर कचरा ला साफ करिच । लउहा-लउहा तरिया ले नहा के आईच । लईका मन ला बासी बांचे ल खवाईच । आस पड़ोस ले लक्ष्मी पूजा के प्रसाद बिसाहू ह माँग के ले आईच । लाई, बतासा, केला, सेव के टुकड़ा, लड्डू, पेड़ा के टुकड़ा, रहय । सब लईका मन ल बाँटिच अऊ बिसाहिन दूनों पीड़ा म बईठ के खाईन । टेटकी कहिथे ददा पेड़ा ह अड़बड़ गुरतूर हे । रामदेव अऊ कामदेव लउहा-लउहा मिठाई ल खाईन । फेर पेट के चिन्ता सताय लगीच । त मुड़ धर के बईठ गे ।

बिसाहिन के पाछू-पाछू ओमी सेठ चल दिस । बड़े गोदाम रहय । बिसाहिन ल अकेला पाके पोटारे कस करिसं । बिसाहिन ह हड़बड़ा गे । आग बबूला होगे । ओकर मुँह ले जो बनिच गारी देईच । ओमी ह कस के कनिहा ल पोटारे रहय । कसमसावत नई बनय । बिसाहिन के गुस्सा कउवा गे । जोर से हड़बड़ाइस, कस के हाथ ल चाब दिच । ओमी कल्ला के छोड़ दिच । बिसाहिन काछा मार के लड़े ल भीड़ गे । बिसाहिन ह कसके लात मारिच । उतान पीठ के भार गिर गे, ओकर छाती म चढ़ गे । कहिच मय छत्तीसगढ़ महतारी के बेटी आँव तोर खून पी जाहंव मोर इज्जत म हाथ डारहंव कहिथच । सेठ भड़वा तोर डउकी लईका नई हे, आज ते तंह ह नारी मन ल सताय बर छोड़ दे, नईतो मार डालिहंव । ओमी सेठ के छाती म चढ़े रहिच । बघनिन, सेरनी कस गुर्रावत रहय । जान बचाय बर ओमी सेठ माफी माँगिच । अऊ कहिच तोला जतके जीनिस चाही आके ले जाय कर, मय तो कुछू नहीं कहिहंव ।

बिसाहिन ल लईका मन के सुरता आ जाथे । भर पेट खाना कई दिन ले नई खाये है । बिसाहिन के गुस्सा थोड़ शांत होईच । ओमी के छाती ले उतर जाथे । ओमी कहिच जान बाचे लाखों उपाय, मोर सेठानी ह का कम हे । कान धर के उठक-बईठक करिच । बिसाहिन ह चाऊर दार, आटा, तेल, नून, बिस्कुट, चना-मुर्रा, अऊ दस रूपिया लेके घर चले गिच । ओमी सेठ ह बिसाहू के नाम म उधारी लिख लेइच । बिसाहिन ह हाथ पाँव धोके, चाऊर के अंधना चढ़ा दिस । दार, भात, आलू के साग बहुत दिन के बाद म रांधे रहय । बिसाहिन के चेहरा म चमक आगे रहय । टेटकी, रामदेव अउ कामदेव ल अपन हाथ म भात-दार खवाईच । बिसाहू दूनो साथ म बईठ के पेट भर भात-दार खाईन । बिसाहू ह जेवन खाके गोसाला के भीतर, पानी, चारा डालथे । सब गाय गोरू मन ठीक रहय । मेन दरवाजा म ताला लगा के घर आ जाथे । रात के दस बजत रहिच । लईका मन सब सोगे रहय । बिसाहिन ह बिसाहू ल अंधियार म छूअत रहय । बिसाहिन रपोट लेथे ।

आसाढ़ के महीना आ जाथे । स्कूल म कामदेव अऊ रामदेव ल बेकुंठपुर के प्राथमिक पाठसाला म भरती करा देथे । लईका मन कक्षा पाँचवी पास कर लेथे । सब माई-पिला मिल के गोसाला के साफ सफाई अऊ दूध बेचे के काम करे लगिन । गाय के गोरस पीके लईका मन बाढ़े लगिन, मस्त हट्टा-कट्टा होय लगिन । टेटकी ह तीसरी कक्षा म चल दिच । रामदेव ल कक्षा छटवीं म नटवर हाई स्कूल म भरती कराथे । कामदेव ह थोरकून पढ़े म कमजोर रहय, ओकर पढ़ाई लिखाई म धियान नई रहय । अऊ लड़ाई झगड़ा सब ल करय । स्कूल से निकाल देथे । आवारा टूरा संग सराब, जुआ अऊ गांजा पीये बर सिख गय रहय । बिसाहू ह रोजाना समझावय फेर ओकर भेजा म नई घुसरै । बिसाहिन ह घलो बहोत समझाईच । पर दाई ददा के गोठ नई सनिच। रामदेव ह पढ़ाई म बने धियान देवय, ले दे के उहू ह आठवी किलास पास कर लेथे ।

बिसाहू ह कामदेव ल सब घर दूध पहुँचाये बर बोलय, कभू-कभू चले जावय । गोसाला म चारा, पानी गईया म डार देवय । बिसाहिन ह कईथे कि बजरंग राइस मील म सेठजी ल बोल के देखतेव । चसेरी बिनती करिच त कामदेव ल राईस मील म नौकरी बीस रूपिया महीना म रख ले थे । कामदेव काम म धियान देये लगिच । सेठ जी ल खुश रखय । कभू-कभू सेठ जी ह चाऊर दे देवय । चाऊर के बेवस्था होये ले घर म रोजिना चूल्हा बरे लगिच । बिसाहू ह सोचथे कि रामदेव ल घलो कहीं नौकरी म लगवा देतेंव । बिसाहिन कईथे दूध पहुँचाय बर पांडे़ नगरपालिका के सचिव के घर जाथंव बिनती करके देखबो, बिनती चरौसी करे म का काम नई होवय ।

दूसर दिन बिसाहू ह अवधराम पांड़े सचिव, नगरपालिका के बंगला म दूध पहुंचाथ गिच । सांकल ल खटखटाईच त पांडे़ जी निकरिच । बिसाहू ह दूध के डब्बा ल दिच अऊ दूनों हाथ जोरिके कहिथे, मालिक मोर लईका ह आठवीं पास होके पड़े हे, बेकार ऐती-ओती घूमत फिरत हे । पांड़े ह कहिस कि कांजीहाऊस म चरवाहा के जगा हावय । कल ओला एक आवेदन लिखवा के आफिस, टाउन हाल म आ जावे । दूसर दिन बिसाहू ह रामदेव ल लेके नगरपालिका चल देथे । पांड़े जी हा रामदेव ल कोतरा रोड के कांजीहाऊस म चरवाहा, बीस रूपया महीना म नौकरी म रख लेथे । पांड़े ह कहिथे बने ईमानदारी ले काम करबे कभू-कभू बंगला म आके घर के काम कर देबे । रामदेव ह हाँ कहिके कांजीहाऊस म चरवहा बन जाथे । एक-दू ठन गाय-गौरू ल रोजिना चरावय । अईसे-तईसे साल भर नौकरी करत हो गय ।

बिसाहिन कहिथे लईका मन बड़े-बड़े होगे घर छोट पड़त हावय । घर के पिछवाड़ा म सरकारी खाली जगह पड़े हावय । दो खोली के कच्चा परछी उतार देते अच्छा होतिच । बिसाहू ल बात जंच गे । रामदेव अऊ कामदेव ल कईथे कि तोर दाई ह कहत रहिच रे बाबू हो फेर मोर सरीर ह बुढ़ावत हे, जादा दिन के संगी नोहय । दो खोली खपरा वाला बना लेवव । दूनों भाई मिलके माटी के दीवार उठाके कमचील के छज्जा खपरा म छाथे दो खोली तियार कर डारिन । फिरका बने बनाये लागे लगा दिच । बिसाहिन ह गोबर म लीप-पोत के सुधर बना दिच । दूनो खोली म एका एक झन रहे लगिच ।

बिसाहिन ह बीमार रहे लगिच । घर म खाना बनईया तो चाही । टेटकी नोनी ह दाई के दुःख ल जान रहय, टेटकी ह खाना बनावय । भाई, ददा, दाई ल परोसय । कईसे घर के गाड़ी ल खिंचत रहय । दूनों बेरा के खाय के बेवस्था हो गय । बिसाहिन ल चिन्ता होगे – सुनत हौ, कोनों चेत नई करत हव लइका मन सजोर होगिन । का बिसकुट ए तेला बता, मैं तो अढ़ा मनखे आँव टेटकी घलोक तेरा बच्छर के होगे, कहीं सगा-उगा देख तेच नही, मोरो तबियत ठीक नई रहे रंघवइया घलो लाय बर परही न ? ठउका गोठियावत हस, ए बछर टूरा मन के बिहाव निपटा देबो, नोनी अभी छोटक हे, बाद म वोकर बिहाव करबो । कइसे कहिथव बाबू के ददा, टेटकी ल .... कहू उल्टा-सीधा हो जाही त, पहिली वोकर बिहाव के धरम के रक्षा करो । पइसा के जुगाड़ कहाँ ले होही इहां तो भूंजे भोग नही अइसन कहिके बिसाहू बाहिर निकल गे ।

बिसाहू ह अपन संगवारी चैतराम यादव ल कईथे, जोड़ी कहूँ टूरी बाढ़े होइय त बतावव जी । चइतराम चोंगी ल चकमक पथरा म पोनी रख के, रगड़थे । पोनी ह बुग् ले बर जाथे । पोनी जलत रथे चोंगी म रखथे अऊ जोर से सुरकथे । भकभक ले धुँआ-धुँआ, अकबका जाथे । धुआँ ले खोर-खोर के खाँसी खाँसत-खाँसत कहिथे, बिसाहू भईया मोर बात मानबे त मय बतावत हंव । सेठ किरोड़ी मल ह एक बड़े मंदिर गौरी संकर मंदिर अऊ किरोड़ी मल कालोनी बनावत हे । ऊंहे मोर पहिचान के बैसाखू ठेठवार, रोजी-मंजूरी करत हावय । बने दिन ले काम करत हे । ओकर टूरी ह गोरी, नारी, बढ़िया कद काठी के हावय । बने सुघर टूरी हे । मोर कोई टूरा रहितेच ओकर बर बिहाव कर देतेंव । बिसाहू कईथे रामदेव ह तोरे टूरा ऐ ग । कईसे भाई आने मानथच, कोई गैर थोड़े ए । एकेच खून ताय ग । तोर मोर म कोई अंतर नईए । अगर तोर पसंद आगय हे फेर समझ जाव मोला भा जाहय । बने पता बताय भईया, आज नहीं काल जाबो ओकर घर । चइतराम ह चोंगी ल आधा बांचे रहय बुझाईच । टेड़गा पागा म खोंचिस । चईतराम कईथे, भईया मय जात हंव, राम राम ।

बिसाहू ह खूसी म झूमत, मुचमुचावत रहय । बिसाहिन आ जाथे । कईथे का बात हे, बड़ परसन्न हव, हमू ल तो बताव । चईतराम के गोठ ल बता देथे । बिसाहिन कईथे जाव देख के आवव । राम म रामदेव ल पूछिन बिसाहिन ह । रामदेव कईथे का हो ही जउन काम ल करिहव, सही करिहव । बिसाहू ह रात ल लटपट काटिच ।

बड़ भिनसार उठ के गोसाला म चारा-पानी दिच । अऊ दूध ल दूह के बाल्टी म रख दिच । माहवाही वाला मनके घर पहुँचा दिच । बिसाहिन अऊ टेटकी दूनों मिलके गोबर कचरा ल झाड़ीन, बहारिन । तरिया ले लउहा नहा के आ जाथे । चीला रोटी ल बना डारथे । बिसाहू ह चीला रोटी ल लउहा खालिच । तेल फूल लगा के चईतराम के घर लउहा चल दिस । दूनों झन गौरी संकर मंदिर के पास झोपड़ी में गईन । बैसाखू ठेठवार ईंट के चौंरा म बईठे रहय । राम राम जी ठेठवार जी । ठेठवार जी कईथे, जय जोहार जी । आवा बईठा खटिया म । नोनी के दाई पानी लाव । पहुना आये हे । चहत भईया ह आये हे । ओकर संग म एक झन अऊ हे दू गिलास म पानी लेके मनटोरा आथे । बीड़ी सिपचाके दिच । बीड़ी पियत चईत कईथे, बैशाखू ह तोर टूरी ल देखे बर आये हन । नोनी के का नाव हे । रमौतीन बेटी ऐती आत ओ, तोर कका चईत आये हे । टपाटप पाव परिच । बने हुशियार लईका हे ग, बिसाहू ह कईथे, बेटी का किलास पढ़े हस नोनी । रमौतीन कईथे तीसरी किलास पढ़त रहेंव त दुकाल पड़े हे त रायगढ़ आगे हन, पढ़ाई बंद हो गे हे । ठीक हे बेटी । बिसाहू ह पसंद कर लेथे । कईथे रामदेव ल ले के देखेबर आहंव । चल चईत भईया चल । बिसाहू अऊ चईत अपन-अपन घर गोसाला पारा आ जाथे ।

बिसाहू ह घर म जाके बताथे । बिसाहिन कईथे, कल रामदेव ल देखा देबो । रामदेव कईथे दाई का मय देखिहूं, ददा ह देख डारे हे । बिसाहिन कईथे, बाबू देखे के नेंग ल करबो तब बनही । रामदेव, ल लेके रमौतीन ल दिखा देथे । बने गोरी, नारी, ऊँच पूर कद काठी के रहय । बैसाखू ह रामदेव ल देख के कहिथे । हमन नोनी ल देय बर तियार हन । रामनवमी म बिहाव करबो । बिसाहू कईथे सगा भयंकर दुकान पड़े हे । तोरो घर कछु नईये, मोरे घर कछु नईये । फेर बिहाव कईसे होही, दूनों गुने लगथे । बिसाहिन कईथे, हमन पाँच झन बरात लेके आ जाबो, पाँच भावर पार के बहुल बिहाव के ले जाबो । हमन ल कोई दाईज डोर नही़ चाही । मनटोरा कईथे, समधीन बेटी बर तो कपड़ा लूगरा पोलखर, चूड़ी गहना लेहे ल परही । बिसाहिन कहिथे, हमन बरात लेके आबो त सब लगूरा, गहना, चाउर दार लेके आबो । ओही ल पहिरा के बिदा कर देवव । बैसाखू कईथे, जइसे चाहिहव वईसे हो जाही । दार-भात जेवन जेवा के विदा कर देथे ।

बिसाहिन ह टेटकी ल कहिथे, बने सुधार हे तोर जईसे । रामनवमी म बिहाव होही । दाई भउजी आही त बड़ मजा आही । कुरिया ल लीप पोत के ठीक करथे । दूनो़ कुरिया के अंगना म तुलसी के बिरवा लगा देथे । घर के पिछवाड़ा म बेसरम लकड़ी के घेरा कर देथे । ओही म नहाय के ओछा करके खोली बना देथे, जहाँ पानी पिसाब जा सके । खाली पड़े जगा ल जमींदार ले माँग लेथे घेरा बंदी कर देथे । बिसाहिन कईथे, कामदेव के बिहाव संग म निपटा देते ।

रामदेव बछिया गाय गोरू ल चरावय । दाना-पानी देके आ जावय । कभू-कभू पांड़े महराज के घर के साफ-सफाई के देवय । जब भी बाहर से पहुना आवय, रामदेव ह बूता करे । भात रांधे बर बुला लेवय । रामदेव ह भीतर बाहर के सब काम करय । पांड़े जी ल बुढ़ापा रोग पकड़ ले रहय जोड़-जोड़ म दरद के मोर चल फिर नई सकय । रोज रात म रामदेव ले मालिस करावय । सेक्रेटरी साहब के बहू ह साग-भाजी अऊ रंधनी म काम बूता करावय । काम बूता खतम करके जात रहय । लईका मन सब पढ़े बर चल दिन । घर सून्ना रहय । पाड़े जी के बहु कईथे मंय नहाय ला जाहंव, बाथरूम म दो बाल्टी पानी भरदे । रामदेव ह बाथरूम ले निकरत रहिच । कईथे रामदेव मोर पीठ म साबुन लगा दे । नही भउजी, नहीं मय साबुन नई लगावव । महराज मन आ जाही । रामदेव जाये लगथे । पुस्पा पांड़े हाथ पकड़के ले जाथे । यदि नई पीठ म साबुन लगावे त तोर नौकरी ल खा जाहूँ । अऊ धरत कड़कत रहिच कहिके थाना पुलिस म रिपोर्ट भी करा देहूँ । रामदेव डरत-डरत कहिच । भवजी मय आँखी मूंद ले लगा देहंव । पुस्पा ह नहानी घर म सायेच भर पहिरे रहिस । पानी डारके कईथे, रामदेव मोर पीठ म साबुन लगा देबे । रामदेव डरत-डरत पीठ म साबुन लगाईच । कईथे रामदेव पेट अऊ जांघ म साबुन घलो लगा देव । बहोत दिन के बाद मोर पीठ म साबुन पड़े हे । बढ़िया कपड़ा म रगड़ दे । रामदेव के सरीर घलो गरम होगे । मजबूरी म पेट कनिहा, जांघ म साबुन लगाईच । पुस्पा गरम हो जाथे । कपड़ा उतरवा लेथे । बाथरूम म खुद भीड़ जाथे । रामदेव नहीं भउजी, नहीं भउजी ये हा पाप हे, कहत काम निपट जाथे । लउहा-लउहा नहा के पुस्पा कपड़ा पहिन के तियार हो जाथे । रामदेव ल बढ़िया चाय नास्ता कराथे । कईथे रामदेव तोर बिहावल होवईया हे । सीख जाबे त काम आही । रामदेव कईथे नहीं भउजी मय गलत काम नई करंव । रामदेव डरत-डरत ओ दिन काम म गिच । जिंदगी म कोनो महिला के शरीर देखे रहिस न छुए रहिस । बहुत आनंद के अनुभो करिच । एक नवा अनुभ पाके जवान होगे । फेर बिहाव के चिंता लग जाथे । फेर दूबारा कभू ऊहं नई गईच ।

पुस्पा रामदेव के बिहाव बर सौ रूपिया अऊ जेवर गहना भी ले दिच । अऊ पांड़े जी ल बोल के ओला चपरासी भी बनवा दिच । रामदेव के बिहाव के लिये चाऊर, दार, तेल, कपड़ा लुगरा सब के बेवस्था करा देथे । बिसाहिन कईथे, बेटा महाराजिन बड़ दयालु हे । अपन देवर कस तोर बर मया करत हे । रामदेव कईते, दाई सचिव साहब भी अच्छा आदमी हे । ओकर एके ठन बेटा रहिस ओहू ह भोपाल म नौकरी करत हे । ओही कोती दूसर बिहाव करके रथे । इहा घर कभू-कभू आथे । पांड़े महाराज भी बीमार रहिथे । ओकर सेवा जतन करईया तो चाहीं । पुस्पा भउजी ह बहुत सेवा जतन करत हे । का करही बेचारी ह लोग लईका बर तरसत हे । ओकरे सेती गरीब मन के दया करत रहिथे । पुस्पा के आदमी घलो वोही समय म आ जाथे ।

बलराम पांड़े चार छः दिन रहिके भोपाल वापस चले जाथे । पुस्पा बहुत रोथे । मोहुल भोपाल देखा देतेंव । मय तोर परिवार म बिध्न नई डारव । मय ददा के सेवा करिहंव । कई घंटा ले रोवत रहिस । पर बलराम नई पसिचिज । उल्टा कहिच बगठी चालीस बछर होगे कोई लईका न होईच । बगठी ल का ले जाहंव । पुस्पा कहिच एमा तोर कमी हे, तय चाहिथे मोर दवा दूरू करिके बच्चा होवाय रहिथे । मयं दवा दारू खात हंव, मोर शरीर ठीक होगे । देख लेहव येही दिन के आत ले मोर कोरा म लईका खेलत रईही । बलराम ल विस्वास नई होत रहय पति धरम निभा के चल दिस । पुस्पा बहुत रोईच, गिड़गिड़ाईच फेर नई ले गिच । अवध कईथे झन रो बहु “पथरा ले माथा टकराबे त माथा हे फूटही” ऐहा पथरा होगे हे । पुस्पा कईथे बाबूजी येमा मोर गलती कहाँ हे । पांड़े महराज कईथे बहू येमा मोर गलती हे । येला जनमा के गलती करे हन । बदमास बद्तमीज, बददिमाग होगे हे साले ह हमर बात तक नई सुनय का कमी हे तोर म पुस्पा । पुस्पा कईथे बाबूजी गुस्सा झन होवव, बी.पी. बढ़ जाही त बीमार हो जाहा । मय तो बीमार आदमी, फेर तोर सास ल मरे पाँच बछर होगे हे । मोर सेवा जतन कोन करही । जब तक नगरपालिका के सेक्रेटरी ने नौकरी हे तब तक मय जीहंव । मत रो बहू, मय तोला नगरपालिका के स्कूल म सिच्छिका बनवा देथव ।

रामदेव के बिहाव के राम नवमी म होये के तियारी करथे । बिसाहू कईथे, बिसाहिन कहाँ ले पईसा के जुगाड़ करबो । रामदेव अऊ कामदेव ले माँग के देखव । बिसाहिन कईथे, हमर भगवान लक्ष्मी देवी धन के सहायता करे बर सउहात पुस्पा देवी आये हे । पांड़े महराज के बहू, सब बेवस्था कर देहे हे । बिसाहू कईथे, रामदेव, कामदेव बाबू हो रे । मय अपन बहिनी, कका, काकी, ममा, मामी, ल नेवता दे हंव । तुमन अपन संगी संगवारी घलो कहि देहा । बिसाहिन कईथे, सब ले तो कहि देबे फेर मनटोरा के घर तो देखव । पाँच झन बराती लेके बिहाव करके आना हे । कामदेव कहिथे ठीक हे दाई, तुमन रामदेव भईया के तेल चढ़ावव । रामनवमी के पहिली के अंगना म मंड़वा गड़ जाथे । टेटकी ह भईया के बिहाव म बहुत खुस रहिथे । का-का होथे तेला नियम धरम, कूड़न करसा, मंगरोहन, देखथे । टेटकी घलो बिहाव के लाईक किसोरी होगे रहय ।

रामवमी के पहली दिन सब झन सगा मन आगे रहय । दीदी, बुआ, मामी, काकी मन चुलमाटी कोड़े बर गईन । बिहाव गीत गावत तरिया क पार म गईन, माटी के पूजा करिन, सात कुदारी म कोड़िन ।

गीत –
तोला माटी फोड़े ल नई आवय ग धीरे धीरे,
अपन तोलगी ल झोर झोर धीरे धीरे ।

सुवासा राम अधीर ह सरमा जाथे, सुवासा के नेंग ऐ । बिसाहिन ह नवा लूगरा म माँटी ल झोंकथे । काकी, मामी, मन भी झोंकथे । पर्रा म माटी भर के गीत गावत महिला मन आथे । मंड़वा म आके तेल के तियारी करथं, माटी ल भिगो देथे । मंगरोहन बर बढ़ई के घर जाथे । कुड़ा करसी कुम्हार घर से ले आथे । रामदेव के तेल चढ़ाथे । मंगरोहन के ऊपर पर्रा म बईठा देथे, दाई ह सिर ल अंचरा म ढांकथे । बारी बारी से सब तेल चढ़ाथे । अंत म टेटकी ह भईया ल तेल हल्दी लगाईच । रामदेव ठंड म कांपे लागीच, सरीर हल्दी म गीला कपड़ा होगे रहिच ।
गीत –
एक तेल चढ़िगे, लाल अहिबरन के
हो लाला अहिबरन के ।
कहंवा लाई कूड़ा करसी हे,
मंगरोहन हो –

खाना खाके सो जाथे । रामनवमी के दिन अंगना हर भरे रहय । रामदेव के तेल चढ़ावत रहिच टेटकी कईथे, महराजिन भवजी आवत हे । सब झन ओकरे कोती देखे लगथे । रामदेव चुप चाप पर्रा म बईठे रहय । पुस्पा कइथे काबर तेल हल्दी चढ़ाय बर रोक दिहा । सुरू करव । बने गीत गाहव भई । टेटकी कईथे, महाराजिन भउजी तय गीत गा तोर आवाज ह बहुत बढ़िया हे । पुस्पा तेल चढ़ी गीत गाथे । सब झन मिलके हल्दी तेल चढ़ाथे । पुस्पा ह कसके हल्दी तेल चढ़ाथे । टेटकी ह महराजिन के हा, पाँव मुँह हल्दी लगा थे अऊ पाँव पड़ते । टेटकी ल कईथे, अगर मोरो कोनो भाई होतिच त मय तोला बिहाव के ले जातेव । बिसाहिन कईथे, मास्टरिन कोई लइका ढूँढ़ देतेंव त ऐकरो बिहाव कर देतेंव । पुस्पा कईथे हो जाही ओकरो बिहाव एक झन देवर अउ हावय कहाँ हे । कईथे काम ले नई आय हे, अभी अवईया हे ।

बिसाहू सब झन पाँच बरतिया तियार करिच । कामदेव घलो आगे । रामनवमी के दिन पाँच झन बरतिया लेके चल देथे । बैसाखू ह अंगना नीम तरी खटिया म बईठा देथे । दू-चार झन मजदूर मन सुवागत करथे । चईतराम दूनों कोती ले घरतिया, बरतिया बने रहय । रमौतीन तेल हल्दी चढ़े ले अड़बड़ सुघ्घर दिखत रहय । पिंवारा के लुगरा, पोलिखा म जंचत रहय । का कहिबे अति सुघ्घर दिखत रहय । रामदेव देख के परसन्न होगे, मन-मन म होसे लगिच । ईतराम कईथे, भाँवर के बेरा हो गे हे । झोपड़ी के आगू म एक बाँस लकड़ी ल गाड़े रहय, बीच म कलस जला दे रहय । कोई मँड़वा, माजा बाजा नई रहय । मजदूर मन के झोपड़ी म चहल-पहल होगे । सब झन ओही जुरिया जाथे । सात भाँवर के नेंग रामदेव अऊ रमौतीन मन किंजर के पूरा करिथे । सात भांवर के बाद एक चादर बिछा के बईठा देथे ।

भाँवर गीत –
एक भाँवर पड़िके राम अऊ सीता के हो,
एक किल्ला टूटे है लोहारीपूर के ।
वईसे सात किल्ला टूटही ।।

रामदेव अऊ रमौतीन के जोड़ी बने फबत रहय । ओकर दाई ह नवा लूगरा पहिर के काँच के थारी म लोटा, गिलास, कटोरी, चम्मच लोटा म चाऊर भरे रहय । आगू-आगू म कलश धर के काकी आईच। एक भाँवर किंजर के दूनों झन के आरती उतार के रख देथे । मनटोरा ह बटकी लोटा ल मढ़ा देथे । अऊ बेटी दूल्हा-दुल्हिन के दूध म पैर धोईच, पैर पखारिच, चूमा लेथे । मनटोरा के आँखई के आँसू झरर, झरर झरे लगथे, बेटी के बिहाव के सुख के आँसू ऐ, चईतराम कईथे, बैसाखू ह चुमा लिच, पाँच रूपया टिकावन टीकीच । पाँच-छः न मजदूर मन एक-एक दो-दो रूपिया टिकावन म दीच । एक घंटा म बिहाव होगे । चइतराम कईथे बैशाखू खाये-पीये तियारी कर भाई बिहाव होगे । मस्त जेवन करके समान ल एक झोला म भरके, बरात बिदा कर बिसाहू, चईतराम मन आ जाथे ।

बिसाहिन ह बरात परघाये बर जाथे, नवा बहुरिया के आरती उतार के घर अंदर ले आथे सब झन रमौतीन ल परसन करिन । ओही दिन दूनों झन ल तरिया म नहवा के ले आथे । संझौती बेरा म टिकावन म बईठा देथे । सब झन कुछ-न-कुछ रूपिया, पईसा, कपड़ा, चाऊर टिकिन । पुस्पा घलो आगे । रमौतीन ल लूगरा, पोलिखा, टिकली, फुंदरी के समान देईच । टिकावन के बाद दार, भात, सब्जी पूड़ी, खवा के सब झन ल बिदा कर देथे । रामदेन अऊ रमौतीन ल पुस्पा पांड़े ह असीस देथे । दाई, ददा, काकी मामी, ममा सब झन आसीरबाद देईन जुग जुग जीवो, दूधो नहावो पूतो फलो" ऐही दिन के आवत ले कोरा म लईका खेलय । सब पहुना मन दूसर दिन घर चल देथे ।

रामदेव अऊ रमौतीन बड़ खुस रहय । दूसर दिन रात एक कुरिया म खटिया बिछा के साफ, सुथरा पानी टेटकी ह रख देथे । रमौतीन भउजी ल कईथे भउजी आज तूमन ऊहां सोहा, जाव खटिया बिछा देहंव । रमौतीन अऊ टेटकी बरोबर उमर के रहिन । “तय कईसे जानत हस टेटकी । दाई ह कहत रहिस कि आज रात घर दे देव । बिसाहिन ह रमौतीन ल कईथे बहु, घर के हमर देवता ल पूजा कर ले अगर बत्ती, दीया जला के पूरखा देव के “राउतराय” के आरती उतार के पूजा करिच । बिसाहिन कईथे बेटी पीढ़ी दर पीढ़ी हमन पुरखदेव के पूजा करत हन । मोरो सास ह गाँव म पूजा करवाय रहिस । पूजा करे हमन ल छिमा करके आसीरबाद देथे । घर म मंगल आनंद होथे । लोग लईका ल बरकत मिलथे । टेटकी कईथे चल तोर खटिया ल पहुँचा देथंव कहीं भाग तो नहीं जाबे । रमौतीन कईथे, टेटकी तोर ले तो कहाँ जाहूँ मोर घर न दुवार । रमौतीन कईथे, कईसे कईसे होथे तेला जानथस । टेटकी कहिथे, पुस्पा भउजी बतावत रहिस कि पत्नी पति के संजोग होथे । ओतके बेरा म रामदेव आ जाथे । जांथव भउजी भईया आगय ।

रामदेव ह अपन नव जिनगी के सुरूआत करथे । रमौतीन ह पाँव परथे । रामदेव ह कुरिया के दरवाजा ल बंद करके आथे । रमौतीन ल कस के पोटार लेथे । चूमे लगथे । दीया बुझा के सोये लगथे । रामदेव अऊ रमौतीन एक जान अऊ दू परान होगे । जीये मरे के संग कसम खाईन । रमौतीन के मस्त गदराय शरीर रहय, नाक नक्स म कोई सेठाइन से कम नई रहय । नवा जिनगी के किरिया खाके सो जाथे । टेटकी ह सुबह दरवाजा खटखपाथे, भउजी उठ आठ बजे गे हे । रमौतीन लउहा उठ के दरवाजा ल खोलथे, टेटकी ल अति खुसी होईच । रमौतीन कली से फूल बने गे रहय । टेटकी ह भउजी के हाथ ल दबाथे, कईथे बने-बने भउजी । हाँ करके सिर ल डोला देथे रमौतीन ह । टेटकी अऊ रमौतीन तलाब कोती लोटा धर के बाहिर जाथे । तरिया से नाके आ जाथे । रमौतीन ह अगरबत्ती गूंगरधूप जला के देवता के पूजा करथे । तुलसी के चौरा म अगरबत्ती रखथे । रंधनी घर म चल देथे । बिसाहिन अऊ बिसाहू ह बहूपत्तो हाथ के खाना जेवन ल पेट भर खाईच, कहिच बहुत दिन के बाद भर पेट भात खायेव हंव । बिसाहिन कईथे वाह बेटी का बढ़िया भात रांधे हच । टेटकी कईथे वाह भउजी कहाँ ले सिखे हच । रमौतीन कईथे, मोर दाई ले । गौरी संकर मंदिर के तीर म एक सेठ जी यहाँ बरतन माँजत रहेंव, सेठाइन ह मोला खाना बनाय ल सिखाईन । बिसाहिन ह आसीरबाद देईच, आजे के दिन ले तोर गोद म लईका खेलय, मय खेलावय । बढ़िया घर के दिन कटे लगिच ।
क्रमशः

by-www.srijangatha.com

1 Comments:

Blogger magahi said...

हिन्दी की बोली छत्तीसगढ़ी में अन्तरजाल पर उपलब्ध उपन्यास देखकर अत्यन्त हर्ष हुआ । हिन्दी की बोलियों में सामाजिक, सांस्कृतिक आदि से सम्बन्धित कुछ ऐसी विशिष्ट शब्दावली होती है जो हिन्दी में उपलब्ध नहीं है । अतः हिन्दी की बोलियों में यदि साहित्य अन्तरजाल पर उपलब्ध करा दिया जाय तो इससे न केवल इन बोलियों का प्रचार-प्रसार होगा बल्कि इससे हिन्दी भी समृद्ध होगी ।

केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो॰ शम्भुनाथ एवं उपाध्यक्ष राम सरन जोशी ने 'हिन्दी लोक शब्दकोश परियोजना' शुरू की है । डॉ॰ अरविन्द कुमार (समान्तर कोश के रचयिता) ने 'हिन्दी जगत" (विश्व हिन्दी न्यास का त्रैमासिक प्रकाशन), जुलाई-सितम्बर 2007, पृ. 29 पर सूचना दी है -

"1991 की जनगणना के आधार पर हिंदी की अवधी, ब्रजभाषा, बुंदेली, हरियाणवी, राजस्थानी, गढ़वाली, पहाड़ी जैसी जो 48 लोकभाषाएँ सूचित हैं हम उन सब के स्वतंत्र कोश बना रहे हैं ।

कहा गया है कि निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल । हिंदी की सभी भाषाएँ हमारी समृद्ध संस्कृति की जीती जागती धरोहर हैं । अनेक कारणों से उनकी प्रगति वांछित स्तर पर नहीं हो पाईं; कुछ भाषाएँ तो डर है कि मरणासन्न हैं । लेकिन एक बार फिर इन भाषाओं के प्रेमियों में इनके संरक्षण और विकास का सपना जागा है । मैंने इंटरनेट पर देखा है कि देश-विदेश में बसे भारतीय अपनी इन भाषाओं से प्रेम करना नहीं भूले हैं । इन में हर प्रकार के चिट्ठे आज पढ़ने को मिलते हैं । कई लोग तो अनेक लोकगीत, कहावतें मुहावरे और शब्दावली की सूचियाँ बना रहे हैं । केंद्रीय हिंदी संस्थान ने इन भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए जो यह क़दम उठाया है वह दूरगामी सुपरिणाम ले कर आएगा । इन भाषाओं के साथ-साथ हिंदी की भी उन्नति होगी ।

इस परियोजना के अंतर्गत हर भाषा के लिए कोशकर्मी नियुक्त किए जाएँगे । ये लोग गाँव-गाँव शहर-शहर जाकर लोकभाषाओं के शब्दों का क्रमबद्ध संकलन करेंगे । बाद में उन का गहन संपादन किया जाएगा । ये सभी कोश न केवल पुस्तक रूप में छपेंगे, बल्कि इंटरनेट पर हर भाषा प्रेमी को मिलेंगे । योजना के लिए कार्यकाल पन्द्रह साल निर्धारित किया गया है । मेरी कोशिश है कि हम इस काम को दस ग्यारह साल में पूरा कर लें ।"
--- नारायण प्रसाद

10:27 PM  

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