छत्तीसगढ़ी उपन्यासःचन्द्रकला

उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी

Tuesday, June 27, 2006

भाग- आठ

पुस्पा देवी ल ठाकुर मोहन सिंह बाजार म मिल जाथे । ठाकुर बताथे, बहन जी मोर माँ खतम होगे हे ब्राम्हण भोज म पंडित जी ल भेजतेव अऊ तहूँ आ जातेव । पुस्पा कईथे, अस ल कहाँ ले के गे रेहेव । मोहन सिंह कईथे कोन जाय इलाहाबाद, गया । गंगा अपवित्र होगे हे । फेर पंडा मन बहुत लुटथे । पंडा मन ले बचे बर मय महानदी चन्द्रपुर म अस्थी ला बहा देय । छत्तीसगढ़ के जनम लेके छत्तीसगढ़ के माटी म मिलगे । आजकल गंगा नई जाना चाही । महानदी ह गंगा ले कम नई ये । महानदी पवित्र नदी हे । पुस्पा देवी कईथे, अच्छा करे ठाकुर साहब । हमर छत्तीसगढ़ के गंगा महानदी हे । जय गंगा मईया कहिके विसर्जन कर दे । ठाकुर साहब नेवता देके चल देथे । पुस्पा देवी बलराम ल बताथे । बलराम पांड़े तियार हो जाथे । दूसर दिन पुस्पा तियार करके ठाकुर साहबे के घर दरोगा पास पहुँच जाथे । तेरही भोज म बने आदमी जूरे रहय । ठाकुर साहब पंडित मन ल बाम्हन भोज करात रहय । बाद म बलराम पांड़े आथे । ठाकुर साहेब बाम्हन के पंगत म बईठा देथे । दोनो पत्तल रख दे जाथे । रोटी, मिठाई, कलेवा परोस देथे । ठाकुर साहेब भोजन ग्रहण करे बर दोनों हाथ जोड़ के निवेदन करथे । पास म बईठे पुरोहित पाठक ह कईथेष ठाकुर साहेब बाम्हन के पंगत म ईसाई ल बैठा देहच । हमन बोजन नई खावन । जब तक ऐला नई उठाबे । बलराम ल बेइज्जत करके अपमानित कर देथे । पंडित मन सब झन उठ जाथे । ठाकुर बहुत हाथ पाँव जोड़थे, फेर बाम्हन मन नई मानिच । पंगत ल उठा देथे । बलराम अपमानित होके बिना भोजन करे घर आ जाथे । पुस्पा ब्राम्हन मन ल बहुत भला बुरा कईथे, बड़ा पंडित बने हे । मनखे न नई चिनहय । पंडित मन कईथे, कल तक तो फादर बने रहिच । आज अपन मन के पंडित बनगे । अपन मन के मुसलमान बन भी जाही । फेर बाम्हन बन जाही । अईसे विधर्मी के संग पंगत म नई खाना बात बहुत बढ़गे । ठाकुर बहुत अनुनय विनय करिच । पुस्पा अऊ बलराम अलग कमरा म भोजन ग्रहण करीन । पुस्पा देवी गुनगुनात घर चल देथे ।

बलराम घर जाके पुस्पा बर बिगड़ गे । काबर अईसे जगा म ले जाथच । मोर बहुत अपमान होय हे । बलराम कईथे, मय फादर रहितेंव त येही मन मोर गोड़ धोतिन । चाटू कार पंडित मन अपमानित करीन हे । बलराम कईथे, जे समाज म सम्मान नईये ओ समाज ल छोड़ना चाहिये । पुस्पा माफी माँगथे । ठीक हे अब बाम्हन भोज म नई जावन । बलराम के मन उचट गे । मय आके गलती कर डारेंव । सम्मान के द म रहेंव हजार आदमी नमस्कार करय । आज मय अछूत होगेंव । बलराम कईथे, हिन्दू समाज के टूटे के कारण येही पोंपा पंडित मन हे । मनखे ल मनखे नई समझय । कुकुर, बिलई ल गोदी म उठा सकत हे फेर आदमी के लईका से घृणा करत हे । अईसे ढोंगी मन ल सबक सिखाना चाही । पुस्पा कईथे, अब सो महराज । बलराम कईथे – मय डॉ. अम्बेडकर के किताब सूद्र कौन और कैसे पढ़ा था । डॉ. अम्बेडकर सही कहे हे । डॉ. अम्बेडकर के चितंन ठीक हे । डॉ. अम्बेडकर ने एक सभा में कहा था कि मय जन्म तो हिन्दू धर्म में लिया । जिसमें मेरा कोई गलती नहीं । परंतु मैं जब मरूंगा तो इस धर्म में नही मरूँगा जो कि मेरे हाथ में हे । उसी प्रकार बलराम पांड़े कहता है कि मैं तो मरूँगा तो दूसरे धर्म में । पुस्पा देवी कईथे, अईसे काबर सोचथव । ओ भड़वा बेर्रा पंडित मन ल कईथव । जिहाँ पतरी मिल जाथे बईठ जाथे । का नियम धरम हे चोर मन के । न ऊकर जांगर चलय न कुछ कर सकय, बस दान दक्छिना मिल जावय टूट पड़थे । पुस्पा देवी कईथे, अइसने मन समाज ल तोड़े हे ।

पुस्पा देवी कईथे, पंडित जी चन्द्रप्रकास के सादी पक्की होगे हे । ऐ भडुवा बड़े जात मन कोऊ लड़की नई दीन । अऊ कहय जेकर पिताजी ह इसाई हे कईसे जात ल बिगाड़बो । भले ऊकर टूरी ह मेहत्तर ल लेके भाग जाही । भले बूढ़ाय जाय । भले जहर मंहुरा खाके मर जाही पर चन्द्रप्रकास पांड़े बर नई दिन कह दिच । आज चालीस उमर होत हे । चल भगवान ह सादी करा दिही । पंडित जी पूछथे कहा लड़की मागे हे । लड़की डॉक्टर हे एम.बी.बी.एस. दुर्ग ओकर पिताजी डिप्टी कलेक्टर दुर्ग म हे । एम.एल. भारद्वाज अऊ लड़की के नाम डॉ. प्रेमलता भारद्वाज हे । अऊ उमन सतनाम धर्म मानथे । पंडित कईथे बहुत बढ़िया, सुन्दर निर्णय ले हच । मोर पसंद ईईच । पंडित जी कथे, पुस्पा संत गुरू घासीदास महान संत हे । जेकर दुनिया म नाम हे । लंदन, रोम, अमेरिका, वासिंगटन के लायब्रेरी म विस्व के संतों के सूची म बाबा जी के नाम हे । बारी अचरज के बात हे अपन हमन इहाँ जन्मे पढ़ेन अऊ नौकरी पायेन, फेर संत गुरू घासीदास जी नई जानेन । दुनिया के लोगन जानथे । इतिहास म ओकर कहीं नाव नईये । गुरू बाबा के सिद्धांत वर्ग विहीन समाज व्यवस्था करना । मनखे मनखे एक आय । मानव धर्म के बात कहे हे । जात-पात, छुआछूत, अंधविस्वास, नरबलि, पसुबलि, मूर्ति बूजा के निसेध कर नारी को माता जानो, दोपहर में नागर मत जोतो । अऊ सतनाम को मानो । सतनाम का जाप करो । का गलत बात हे । जीवन जीये बर मांसाहार, नसा, सराब पीये बर मना करे । साकाहारी खाईये । का गलत बात हे । पुस्पा कईथे पंडित जी कोई धर्म लड़े बर नई सिखावय । सब जोड़े ल सिखाथे । पोंगा पंडित अऊ पुस्पा मौलवी मन एक नई होय दय । अपन दुकानदारी खतम हो जाही कहिक, जुड़े नई दय ।

पुस्पा देवी बताथे, फागुन के पंचमी से सप्तमी तक गिरौदपुरी म मेला भराथे । मेला म आदर्स बिहाव होही । दो दिन पहले ले जाय लगही । पुस्पा देवी बहू बर देवर, गहना बनवाय के आदेस दे देथे । बलराम पांड़े अपन जमा पूँजी ला बैंक म जमा कर देथे । दस लाख रूपिया फिक्स डिपाजिट म जमा करथे । रायगढ़ के पास गाँव पटेलपाली म दस एकड़ कृसि भूमि भी खरीद लेथे । रायगढ़ म एक पक्का मकान दो मंजिला भी खरीद लेथे । चन्द्रप्रकास बर सूट चार ठन बनवा देथे । बहू के लिये लूगरा, साया पोलखर पाँच जोड़ी खरीदथे । पुस्पा कईथे, चन्द्रकला बेटी ठीक हे आदर्स विवाह होवथ हे । बिहाव के नेंग तो धर म करना पड़ही । चन्द्रप्रकास के तेल हल्दी लगाय जाही, तभे मजा आही । बूढ़त काल के एक ठन बेटा । ओहू बूढ़त म बिहाव करत हे । चन्द्रकला कथे माँ जईसे चाहत हव वईसे कर लव । पुस्पा कथे बेटी, मोर रिस्तेदार मन नई आवय । सब जात, पात के उधम मचाही । तोर बाबूजी के आय ले, अऊ नहीं आवय । तय पूरनिमा ल चिट्ठी भेज दे जबलपुर । पूरनिमा जरूर आ जाही ।

रमौतीन के अंगना म पहली बार पड़वा गड़त रहय । काबर, कामदेव ह बिहाव नई करे हे । टेटकी ह प्रेम बिहाव कर लीच । बड़े बेटी चन्द्रकला तो कुँवारी है । पूरनिमा के कोर्ट मेरिच होईच । चन्द्रसेन अभी बाँचे हे । पुस्पा कईथे, रमौतीन चन्द्रप्रकास भी तोर बेटा ये । मय तो सिरफ जनम देय हंव । फेर तय तो दूध पिलाके पाले पोसे हच । मोर से जादा तोर हक हे । पांड़े जी तो नाम मात्र के पिता हे । पूरा देख रेख तो रामदेव करे हे । पूरा पिता के जिम्मेदारी निभाय हे । तूही मन असली माँ-बाप अब । मय तो जसोदा माता आँव । पुस्पा देवी कईथे, रमौतीन तोला देख के मोर ममता ह जाग गे । रामदेव के सहयोग से बाबा जी औघड़ बाबा भगवान साम सोगड़ा वाले की आसीस से चंद्रप्रकास होय हे । पुस्पा कईथे रमौतीन बहन दूनों जन माँ बनके तेल हल्दी चढ़ाबो, पुस्पा बेटी ल घलो बुला लावा ।

बलराम रामदेव ल कईथे, रामदेव पं. मुकुटधर पांड़े जीले भेंट कर जाबो भाई । पुस्पा कथे चल महू जाहंव । साहित्य मनीषी ऋषि तुल्य हे । ओकर दरसन करे ले हमरो म कुछ साहित्य, कविता के अंकुर फूटही । रामदेव दूध पहुँचाये जवईया रहय । पांडे जी अऊ पुस्पा भौजी ल कथे । चलना हे त चलव मय जाथंव । बलराम पांड़े धोती कुरता पहिनीच । हाथ म सोटा धर के, टेकत-टेकत धीरे-धीरे बैकुण्टपुर जाथे । पुस्पादेवी, पांड़े जी, रामदेव पीपर पेड़ तरी खड़ा हो जाथे । रामदेव दरवाजा के कुड़ी ल खटखटाथे । दस पन्दरा मिनट बाद पं. मुकुटधर पांड़े जी हा दरवाजा ल खोलिच । धीरे धीरे चलत रहय । बीमारी ले उठे रहय । रामदेव अंदर जाके दूध ल गरम करे बर चूल्हा म रख देथे । रामदेव ह पुस्पा देवी अऊ बलराम पांड़े के परिचय कराथे । मुकुटधर पांड़े कईथे, आप अवधराम पांड़े जी के सुपुत्र हव । हाँ हाँ – मय बलराम पांड़े भोपाल म नौकरी म चल दे रहेंव । परछी म लकड़ी के कुर्सी म बईठाथे । अवधराम पांड़े जी ल अच्छा जानत रहेंव । नगरपालिका म सेक्रेटरी साहब सहिस । बढ़िया आदमी रहिच । कभू कभू साहित्यिक चर्चा करे बर आवत रहिच । आवधराम जी के देहान्त होगे हे । बलराम पांड़े बताथे, मय ईसाई बन के फादर बनगे रहेंव । पिताजी बहुत नाराज होगे रहिच । अपन सम्पत्ति से अलग करके, चिता म मुखाग्नि देय बर से वंचित कर देय रहिच । चन्द्रप्रकास के नाम वसीयत लिख दे हे । मय तो कुथ दिन पहले बेंजामिन फ्रांसिस से बलराम पाण्डेय बनगे हंव । येहू ह पुस्पा देवी के कारन ब्राम्हन बन गेंव ।

पं. मुकुटधर पांड़े जी साहित्य के संबंध म चरचा करिच । इंदौर के साहित्यिक मित्र, भोपाल के मित्र मन के बारे में पूछिच । पंडित जी बताईच कि मोला साहित्य के पद्मश्री के उपाधि मिले हे । गुरू घासीदास विश्वविद्यालय ह मोला डी. लिट् के उपाधि देय हे । एक बड़े साहित्यिक कार्यक्रम म श्री डा. शिवमंगल सिंह सुमन, सरचंद्र बेहार, स्यामलाल चतुर्वेदी, डॉ. विनय कुमार पाठक, डॉ. बलदेव साव, डॉ. बिहारी लाल साहू, अऊ बहुत झन साहित्यकार मन उपस्थित रहीन । बड़े गरिमा मय कार्यक्रम म डी. लिट् की उपाधि अऊ सम्मान करीन । मोला अच्छा लगे रहिच । मुकुटधर जी कईथे, अब मोर उमर तिरासी साल होवत हे । रामदेव नोनी हे कहाँ गे हे । दूध अमराय आय त टपाटप पाँव पड़त । बने नोनी रहिच । पुस्पा कईथे पंडित जी चन्द्रकला ल कईथव । हाँ हाँ ओइसने नाव रहिच । बढ़िया झुववा, बेनी गांथ के आवय । रामदेव कामदेव ह जीयत हे के नहीं । रामदेव कथे अभी जीयत हे महराज । पंडित जी कईथे बड़े साहित्य कला प्रेम रहिस । तबला बढ़िया बजावत रहय । ऐ ही पीपर तरी म रामायण मंडली म तबला ढोलक बजाय । बलराम जी कहाँ कहाँ रहेंव । मय भोपाल अऊ इंदौर सहर म जादा रहेंव । इंदौर के चर्च म फादर रहेंव । मोर तीन लड़की दूरस पत्नी रोमा के हावय । तीनों विदेस म रईथे । रोमा के तीन चार महीना पहिले मृत्यु होय हे । इंदौर म कोनो नईये । रायगढञ म आगे हंव । फादर से बलराम पांड़े बन गेंव । मुकुटधर जी कईथे बहुत मजेदार आदमी हज जी । जब जी म आईच फादर बनगे । फादर के चोंगा केलो नदी म फेंक के बलराम पांड़े बन गे ।

बलराम पांड़े कथे । पंडिच जी जीवन म का-का करे ल पड़थे । आप तो ठहरे साहित्यकार, सन्यासी आदमी । एक किताब लिख डालब । मुकुटधर जी कईथे, जरूर लिखहंव । एक दो कविता सुनाथे । डॉ. बलदेव साब अऊ डॉ. बिहारी लाल साहू ओ समय कविता लिखय तेला सुधरवाय आय रहय । पंडित जी सुधर के समझावय । कहय लिखते जाओ लईकों लिखते जाओ । एक दिन आप लोग सिद्ध हो जाहव । पुस्पा देवी कईथे, महराज अब रोजिना आबो । साहित्य तीर्थ म हूम मन पाप ला धो लेबो । रायगढ़ ल साहित्य तीर्थ के रूप म देस भर मानत हे । आप छायावाद के प्रवर्तक आव । आपके कविता कुररी बहुत प्रसिद्ध हे । महानदी कविता बहुत बढ़िया हे । पंडित मुकुटधर कईथे, अईसे अलवा जलवा लिखे हंव । जेला पढ़ना हे पढ़य । नई पढ़ना हे त झन पढ़य । सफेद दाढ़ी म हाथ फेरत कहिच । बलराम तोर उमर भी मोर अतक हो ही । हाँ पंडित जी कुछ कम हे अभी बियासी बछर होगे हे । आप मन एक बछर बड़े आव । पुस्पा कईथे अब चलथ हन । पैर छूके परनाम करथे । बलराम के गले मिलथे । आयकर भाई बलरामा मोरो टूरा ह मोर नई सुनय । न कोई सेवा करय । रामदेव कभू-कभू मालिस करके चले जाथे । रामदेव कईथे जात हन महराज ।

चन्द्रकला सादी के तियारी करत रहय । जेवर, गहना, लूगरा, तेल, अनाज, सभी समान खरीद के ले आथे । पूरनिमा हा दो लईका लेके आथे । बड़ी लड़की रूना लड़का के नाम गुल्लु रखे रहय । पूरनिमा बढ़िया दिखत रहय । सुनील सांडिल्य भी एक हप्ता के छुटटी लेके आ गेय । तीन दिन पहिली ले अंगना म मड़वा गड़ गे । रामदेव, कामदेव, टेटकी अऊ ओकर लड़की जानकी आय रहय । घर भरे भरे लगत रहिच । पुस्पादेवी के भतीजी उर्मिला भी आय रहिच । चन्द्रकला के दादा के भाई के लड़का, लड़की आगे । पचास झन इकट्ठा होगे । मालूराम सेठ जी ह भोजन बनाय के ठेका गुप्ता होटल वाला ल दे दे रहय । चन्द्रकला, सेठ जी से मिलके धोती, लगूरा, पेंट शर्ट के कपड़ा पचास जोड़ी ले आथे । रामदेव ह मड़वा बनाय बर गिच । आम, डूमर के डंगाल काट के एक गाड़ी ले आय रहय । चन्द्रसेन, कामदेव, अऊ सुनील मिलके मड़वा गाड़ देथे । चन्द्रकला पूरनिमा हल्दी भिगा दे रहय ।

पुस्पा देवी सब ल धोती, लूगरा, पेंट, कुर्ता के कपड़ा बाँट देथे । रमौतीन ल अपने नई लूगरा देईच । गड़वा बाजा भी लगा ले रहय । गूदम-गूदम, गड़वा बाजा, मोहरी, टिमकी डबरा बाजत रहय । गली म बाजा बाजत रहय । को होथे कईके लईका मन जुरिया गे । रमौतीन कईथे, दीदी चाल माटी पूजा करे जाबो । पूरनिमा ल पर्रा म दीया जला के सिर म बोहके, सुनील कुदारी धर के निकलिच बिहाव गीत-गावत महिला मन तलाब पार म माटी के पूजा करीन । सुनील ह कुदारी म काटी खोदिच । बिहाव गीत गावत गावत पर्रा म माटी लेके । घकर आ जाथे । मड़वा पहुँच के माटी रख देथे । रमौतीन अऊ पुस्पा देवी अपन अचरा म माटी झोक ले लाथे । करसा कुंडा बर कुम्हार घर जाथे । मंगरोहन बर बढ़ाई के घर जाथे । पूजा करके घरम लाथे । राम नव बजे चन्द्रप्रकास ल मड़वा म बईठा के तेल हरदी चढ़ाथे चन्द्रकला, पुस्पादेवी, रमौतीन, टेटकी, जानकी, अंत म पूरनिमा पूरा सरीर बांच हल्दी ल लगाथे । सिर म अचरा के छाया पुस्पा देवी रखथे । बिहाव गीत, मंगल गीत गाथे । रात म खाना खा के सब सो जाथे ।

चन्द्रप्रकास के तीन दिन ले तेल हरदी लगाथे । चौथे नहवा के तियार कर देथे । दूलहा बारात जाय बर निकरिच । सब तीन ठन जीप, कार म बईठ के गिरौदपुरी मेला जाथे । साथ म खाय पीये के पूरा समान रथे । बलराम पांड़े अऊ रामदेव पगड़ी धोती पहने रहय ।

क्रमशः

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चंदा ह अपन मामा के घर बिहाव म चल दे रहय । प्रेमलता के भी तेल हरदी चढ़ाय रहय । भारद्वाज साहब अपन खास आदमी मन ल बताय रहय के प्रेमलात के बिहाव गिरौदपुरी मेला म करबो । सादी के तियारी करके तीन कार मीनी बस म बईठ के गिरौदपुरी चल देथे ।

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