छत्तीसगढ़ी उपन्यासःचन्द्रकला

उपन्यासकार- डॉ.जे.आर.सोनी

Sunday, June 25, 2006

भूमिका

समाज के भीतर की सच्चाई की पड़ताल

छत्तीसगढ़ी में अब उपन्यास-लेखन की परंपरा तेजी से बढी़ है । वस्तुतः किसी भी भाषा को पुष्ट और साहित्य की उच्चतम शिखर पर पहुँचाने के लिए उस भाषा में उत्कृष्ट गद्य रचनाओं का होना अत्यंत आवश्यक है । भारतेन्दु ने हिंदी-गद्य को जो आधार-भूमि दी, वह आज हिंदी के शिखर पर पहुँचने के प्रमुख कारकों में से एक है । छतीसगढी़ गद्य को भी शिवशंकर शुक्ल, कृष्णकुमार, केयूर भूषण, पालेश्वर शर्मा डा. विमल पाठक, लखनलाल गुप्त, नंदकिशोर तिवारी, विनय पाठक, आदि ने उपन्यासों और अन्य रचनाओं के माध्यम से आधार-भूमि दी है । डॉ जे. आर. सोनी भी इस दिशा में नई पीढी़ के साथ निरंतर सृजनशील हैं ।

चन्द्रकला उपन्यास के बहाने डॉ. सोनी छत्तीसगढ के मूर्धन्य विद्वानों को उपन्यास का जीवंत पात्र बना दिए हैं । छत्तीसगढ़ की संस्कृति परंपरा, सामाजिक जीवन, रहन-सहन और भीतर-ही-भीतर चल रही विसंगतियों को कथात्मक शैली में इस उपन्यास में पिरोया गया है । साथ ही डॉ. सोनी ने वर्णनात्मक शैली में अनेक घटनाओं को जीवंत करते हुए विभिन्न आदर्शों और उदाहरणों के लिए संदर्भ हेतु प्रस्तुत किया है ।

इससे पूर्व की उनकी सृजन-यात्रा पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उढरि़या और पछतावा उपन्यास, नीरा कहानी संग्रह और अनेक कविता-संग्रहों के माध्यम से उन्होनें छत्तीसगढ़ की संस्कृति और दलित-शोषित समाज के भीतर के द्वंद्व को उन्होने खुले रूप में प्रस्तुत किया है । प्रस्तुतीकरण में आक्रोश और उत्तेजना के शब्दों के स्थान पर समन्वय और समतावादी शब्दों को आश्रय लिया गया है, जो समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट होकर सम्मानपूर्वक एक-दूसरे का आदर करने का स्वर प्रस्तुत करता है । डॉ. सोनी ने यात्रा-संस्मरणों के माध्यम से देश-विदेश की भी पड़ताल की है । उनका लेखन सकारात्मक रहा है ।

पात्रों की संख्या अत्यधिक होने के बाद भी उनके चरित्र-चित्रण में लेखक सफल दिखाई देता है । संवाद-शैली सहज और आम जनजीवन से आधार लिए हुए है । इसी तरह उपन्यास की भाषा भी बिलासपुर और रायपुर मिश्रित छत्तीसगढ़ी है जो मानक छत्तीसगढ़ी के आसपास होते हुए उनके परिवेश में रची-बची छत्तीसगढ़ी का प्रभाव लिए हुए है । डॉ. सोनी के इस उपन्यास के बहाने समाज, घर-परिवार, खेत-खलिहान, राजनीति, संस्कृति, शोषण, न्याय-अन्याय आदि के भीतर के मर्म को समझा जा सकता है । वस्तुतः डॉ. सोनी अपने आसपास में घट रही सच्चाई और यथार्थ को शब्दों के पुष्पगुच्छ में एकत्रित कर पाठकों को परोसने का कार्य करने की ललक रखते हैं ।

उपन्यास न केवल छत्तीसगढ़ी के पाठकों के लिए संदर्भ-सूत्र का कार्य कर सकती है बल्कि हिंदी के पाठकों को भी जोड़ने और समाज के भीतर की सच्चाई को परखने को विवश कर सकती है ।

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डॉ. सुधीर शर्मा
सचिव
छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
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प्रस्तुतिः सृजन-सम्मान, छ.ग.

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